इजरायल - फिलिस्तीन विवाद : उग्र राष्ट्रवाद और विश्व युद्ध से उपजी विकराल समस्या

Updated: Oct 23, 2021

एक बहुत अच्छी उक्ति है कि "जो समाज अपना अतीत नहीं जानता , वह अपने भविष्य को लेकर भी सजग नहीं हो सकता कि उसे जाना कहां है।" तात्पर्य यह है कि घटनाएं, समाज और परिस्थितियां, जो हमें आज दिखाई देती हैं, उनके अस्तित्व का कारण उनके अतीत में छिपा होता है। पिछले दिनों अल-अक्सा मस्जिद में प्रवेश और उस क्षेत्र पर अधिकार को लेकर इजरायल और फिलीस्तीन के बीच दोबारा खूनी संघर्ष शुरू हो गया, जिसने पूरी दुनिया के अखबारों और समाचार एजेंसियों की सुर्खियां बटोरी। पिछले वर्ष तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (जो अपने इजरायल समर्थित दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे) ने मध्यस्थता कर 'अब्राहम समझौते' के माध्यम से पश्चिम एशिया के चार देशों के द्वारा इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता दिलवाने के बाद इस क्षेत्र में शांति स्थापना कीकिरण जो दिखाई थी, लेकिन वह इस घटना के बाद फिर धुंधली नजर आ रही है।


यहूदी, मुस्लिम और ईसाई:पिछले वर्ष इजरायल को जिस 'अब्राहम समझौते ' द्वारामान्यता दी गई , इसका नाम अब्राहम, तीन धर्मों ( ईसाई, यहूदी और इस्लाम) को आपस में जोड़ता है। अब्राहम यहूदी धर्म के सबसे पहले पैगम्बर माने जाते है, जिन्होंने एकेश्वरवादी परंपरा की शुरुआत की। पहली शताब्दी में ईसा द्वारा ईसाई धर्म की नींव रखने और सातवीं शताब्दी में पैगंबर मोहम्मद द्वारा इस्लाम की नींव रखने के बावजूद इन धर्मों के बीच जो एक मुखर समानता थी, वह अब्राहम परम्परा अर्थात एकेश्वरवादी होना।


‌फिर बात आती हैं की इन तीन धर्मों के बीच आज जो इतनी व्यापक अलगाव की स्थिति दिखती है, उसकी जड़े इतिहास में कहां तलाशी जाए ?यहूदी धर्म यरुशलम को पवित्र मानता है। और उनका पहला पैगम्बर अब्राहम को माना जाता है। यहूदी धर्म के उपासक एकेश्वरवादी थे तथा मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते थे ,जबकि रोमन शासक और साम्राज्य में बड़े पैमाने पर मूर्ति पूजा प्रचलित थी। जब ईसा मसीह को स्थानीय रोमन गवर्नर ने सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया तो ईसाइयों के मन में यहूदियों के प्रति पूर्वाग्रह बना कि ईसा के क्रूडिफिकेशन में यहूदियों का भी हाथ था। दूसरा कारणमध्य काल में और उसके बाद आधुनिक समय में ईसाई बहुल देशों में यहूदियों का उत्पीड़न और उनसे घृणा का कारण यहूदियों का व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्रों में बहुत कुशल होना था, जिसके कारण वे जहां जाते वहां के व्यापार - वाणिज्य और व्यवस्था पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेते थे। सोलहवीं शताब्दी के महान अंग्रेजी नाटककार और कवि विलियम शेक्सपियर के नाटक "मर्चेंट ऑफ वेनिस" में एक ऐसे ही चालाक यहूदी व्यापारी शैलॉक का जिक्र मिलता है। 1930 की वैश्विक महामंदी के बाद जब जर्मनी में नाज़ी पार्टी के नेता के रूप में हिटलर का उदय हुआ और उसको व्यापक सफलता मिली तो इसका एक कारण जर्मन ईसाई व्यापारी एवं धनाढ्य वर्ग द्वारा यहूदियों के विरोध के नाम पर हिटलर का समर्थन था। दुनिया भर में आधुनिक विचारों एवं शिक्षा का प्रसार करने का दावा करने वाले यूरोपीय देशों द्वारा यहूदियों के साथ 1870 से 1940 के दशक तक किया गया व्यवहार ही यहूदियों द्वारा अपने एकअलग धार्मिक देश की मांग के रूप में परिणत हुआ।





‌अगर यहूदियों के अरब मुसलमानों के साथ आज के ख़राब संबंधों की चर्चा की जाए तो हमेंइस तनाव की जड़ उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में दिखाई देती है ,जब 1877 में स्विट्जरलैंड के बेसल शहर में प्रवासी यहूदियों का सम्मेलन आयोजित किया गया और फिलीस्तीन क्षेत्र में एक यहूदी देश स्थापित करने की मांग की गई।इसके द्वारा यहूदियों ने अपने लिए एक अलग देश की स्थापना के लिए विश्व की सरकारों पर दबाव बनाना शुरू किया।


‌अतीत में मुस्लिमों और ईसाईयों में चार शताब्दियों तक यरूशलम के पवित्र स्थल पर अधिकार को लेकरधर्मयुद्ध हुए। ओटोमन साम्राज्य की स्थापना से यहूदियों की एक बड़ी आबादी तुर्क शासकों के अधीन आ गई, लेकिन तुर्क शासकों एवं यहूदियों में कोई स्पष्ट अंतर्विरोध नहीं दिखने को मिलता।20वीं शताब्दी की शुरुआत में ऑटोमन साम्राज्य टूटने की कगार पर खड़ा था, तब मध्य पूर्व ( पश्चिम एशिया)के इन इलाकों पर वास्तविक प्रभुत्व ब्रिटेन का था। इस दौरान ब्रिटेन ने साम्राज्यवादी असंतुलित नीतियों और अरब- यहूदी दोनों के तुष्टिकरण के माध्यम से समर्थन हासिल करने के प्रयास किए, उसी का परिणाम इजरायल-फिलिस्तीन विवाद की जन्म है।


यहूदी प्रवासियों ( diaspora) का प्रभाव:

लगभग हर देश की जनसंख्या का एक भाग विभिन्न देशों में प्रवासियों के तौर पर निवास करता है, लेकिन साथ ही स्वयं को अपने मूल देश में किसी प्रकार से जुड़ा हुआ भी महसूस करता है।वह भले ही जहां भी निवास करें, लेकिनअपने मातृदेश के प्रति नीति को भी प्रभावित करते है और अगर वह अच्छी खासी संख्या में हो, तब तो व्यापार, व्यवस्था एवं प्रशासन को भी प्रभावित करने लगता है। आज वैश्वीकरणके समय में इस प्रकार के उदाहरण काफी मिलते हैं।


लेकिन इनसे यहूदी मतावलंबियों का उदाहरणविशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों का परिणाम है, जो इजरायल के लिए विशेष लाभकारी रहा। 1948 में यहूदी धर्म के आधार पर इजरायल का गठन होने से पहले तक , वे विभिन्न देशों , इलाकों में छोटी छोटी संख्या में बंटे हुए थे। यहूदी जनसंख्या ने अपनी बौद्धिक उत्कृष्टता एवं व्यापार , ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की कर अपनी छोटी-सी ही जनसंख्या से किसी भी देश की नीति एवं व्यवस्था पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफलता हासिल कर ली। । प्रथम विश्व युद्ध में धनी यहूदी व्यापारियोंएवं ताकतवर समूहों ने ब्रिटेन की सहायता की, जिसके बदले में यहूदियों को खुश करने के लिए बालफ़ोर उद्घोषणा के द्वारा उनको एक यहूदी राष्ट्र देकर खुश करने की कोशिश की गई। दूसरी बात इजरायल के निर्माण , उसको मान्यता देने तथा अरब शक्तियों से उसके संरक्षण में संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति का कारण अमेरिका में रहने वाली ताकतवर यहूदी लॉबी का दबाव भी है , जो 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति के पद के चुनावडोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में साफ दिखा।

• बालफ़ोर उद्घोषणा और उसकी अधूरी पूर्ति :1917 में ब्रिटेन के अफसर आर्थर बाल्फोर ने यरुशलम की यात्रा की , जिसके बाद ब्रिटेन की महारानी के नाम से यह घोषणा की। इसमें यहूदियों के लिए एक अलग राष्ट्र के साथ ही फिलिस्तीनियों के साथ भी न्याय की बात थी। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि इस घोषणा के पीछे का कारण यहूदी प्रवासियों का विश्व युद्ध में ब्रिटेन की सहायता था। इस घोषणा के बाद से अरब क्षेत्र में ब्रिटेन और यहूदियों के खिलाफ व्यापक घृणा का प्रसार हुआ। क्योंकि यहूदियों के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र का मतलब था ,फिलिस्तीन का एक हिस्सा छीन लिया जाना।नाज़ी जर्मनी में यहूदियों का व्यापक नर संहार और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के चलते अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में यहूदियों के प्रति सहानुभूति कीलहर थी। इसी क्रम मेंभारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल लाल नेहरू ने भी इजरायल नामक देश की स्थापना का समर्थन किया। भारत इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश बना।


एक उत्पीड़ित समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय का उत्पीड़न: सदियों से यहूदी धर्म के मतावलंबियों को ईसाई धर्म के मतावलंबियों से कुछ अंतर्विरोधोंऔर अपनी बौद्धिकता तथाविभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसकी पराकाष्ठा नाजी जर्मनी मेंहुई। इस दौरान यहूदियों को लाखों की संख्या में गैस चेंबरों में यातनाएं देकर तथा विभिन्न अमानवीय तरीको से मौत के घाट उतारा गया। लाखों की संख्या में यहूदी विभिन्न देशों में शरणार्थी बनकर पहुंचे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी नाजी जर्मनी से भागकर संयुक्त राज्य अमेरिका में शरण ली थी। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति या समुदाय पर जो पीड़ा गुजरती है, वह उस पीड़ा से गुजरते किसी और समुदाय के दर्द को बेहतर तरीके से समझ सकता है। लेकिन इजरायल-फिलिस्तीन के मसले मेंसदियों से उत्पीड़न के शिकार यहूदी, अबफिलिस्तीनियों को अपने उग्र राष्ट्रवाद एवं उपनिवेशवाद का शिकार बनाकर शरणार्थियों की तरह दर-दर भटकने को मजबूर कर रहे हैं। आज फिलिस्तीन देश के नाम पर केवल वेस्ट बैंक का इलाका फिलिस्तीन के लोगों के पास बचा है, जिसका भी पूरी तरह नियंत्रण उनके पास नहीं है। गाजाइलाके पर 'हमास' नामक चरमपंथी फिलिस्तीनी संगठन का नियंत्रण है, जिसकी चरमपंथी गतिविधियों के कारण और इजरायल की हठधर्मिता के परिणाम स्वरूप सैकड़ों निर्दोष फिलिस्तीनियों को जान गवांनी पड़ती है।


• आगे की राह: इजरायल और फिलिस्तीन के निर्माण के समय कीपरिस्थितियां अब नहीं रह गई हैं। इजरायल ने 1948, 1967,1973 में अरब देशों के साथ लड़े गए विभिन्न युद्धों में दूसरे अरब देशों के साथ-साथ फिलीस्तीन का एक बड़ा भू- भाग हड़प लिया। 1993 में यासिर अराफात के नेतृत्व में PLO यानी फिलिस्तीन मुक्ति संगठन ने इजरायल देश को मान्यता देते हुए ओस्लो समझोते पर हस्ताक्षर किए ,लेकिन उसी समय 'हमास'नेइस समझोते को मानने से इन्कार करने के साथ इजरायल पर गोलीबारी और रॉकेट लॉन्चिंग की, जिससे यह शांति समझौता विफल हो गया। 2006 में गाजा और वेस्ट बैंक में संपन्न हुए चुनावों में हमास को भारी सफलता मिली और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के साथ मिलकर सरकार भी बनाई। लेकिन इजरायल के मुद्दों पर व्यापक अंतर्विरोध के कारण सरकार चल नहीं पाई। इजरायल और फिलीस्तीन के बीच सीमा विवाद की समाप्ति और शांति स्थापना के बीच सबसे बड़ी बाधा 'हमास' जैसे चरमपंथी संगठन तो है ही, साथ ही दूसरी तरफ इजरायल का उग्र राष्ट्रवाद भी इसमें बड़ा बाधक है।

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