कोई देख रहा है





आधुनिक इतिहास इस बात का गवाह है कि संकट के समय लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कई बार टूटने के कगार पहुंची या अपना अस्तित्व ही गंवा दिया। लोकतांत्रिक उथल- पुथल से जर्मनी, इटली और कई यूरोपीय देश गुजरे है।

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की भुजाएं कितनी मजबूत है, इसका जायजा संकट के समय इसके व्यवहार से पता चलता है। किसी व्यवस्था का ढ़ह जाना एक बात है, लेकिन अपनी उपस्थिति बिना कुछ संघर्ष किए गंवा देना दूसरी बात है। हाल में अमेरिकी मीडिया का तथा चुनाव में कई राज्यों के चुनाव अधिकारियों का राष्ट्रपति के सामने ना झुकना इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। वहीं इटली में मुसोलिनी की अराजकता के सामने पुलिस व्यवस्था, संसद और सेना का मूकदर्शक बनने जैसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है। भारत में भी कोरोना काल में कई बार ऐसे मौके आए, जब लोकतंत्र और संघवाद की रोशनियां बुझती प्रतीत हुई। यह बात खतरनाक थी कि कई संस्थानों ने रोज 2500-3000 लोगों की मृत्यु पर आंखे मूंद ली। चुनाव आयोग के जिद्दीपन के उदाहरण को दर्ज किया जाना चाहिए। इसकी इस चुनाव के मसले पर हुई सभी बैठकों की रिपोर्टों को भी सार्वजनिक किया जान चाहिए, जिससे जवाबदेही तय हो कि आखिर कौन- से तर्क थे, जो लोगों की जान से भी ऊपर स्वीकृत किए गए।

हमने कोरोना महामारी से जूझने के तरीके में पिछले करीब 400 दिन से कोई आमूल बदलाव शायद ही देखा हो। कभी भी आम नागरिक के अनुशासन के अलावा कुछ खास नहीं दिखा। बड़े -बड़े भाषण दिए गए, लेकिन उनकी कथनी के विपरीत करनी में उल्टी गंगा साफ दिखी। दांव पर लगी लाखों जिंदगियों के बावजूद मीडियां मैनेजमैंट , विभिन्न धुर्वीकरण के हथकंडे, बड़ी - बड़ी हैडलाईन, हमेशा नए बली के बकरे के साथ लोगों को गुमराह करना, भाषणों का वाग्जाल तथा विभिन्न तरह के बहुत सारे पैंथरे आम बात थे।

लेकिन इस बार न्यायपालिका में पिछले कुछ महिनों में बदलाव की वह बहार देखी गई , जो इसे लोकतंत्र के प्रमुख तीन स्तंभ में रखती है। इन बदलावों को क्रांतिकारी परिवर्तन की श्रेणी में रखना भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि यह वहीं न्यायपालिक है, जिसने पिछले साल कई गंभीर मुद्दों पर सुनवाई से इंकार कर दिया या एक ढीला-ढाला रवैया अपनाया।


लेकिन इस बार न्याय के देवता अलग अवतार में नजर आए। विभित्स दृश्य और तड़पती जनता की चीखें इतनी तेज और ज्यादा थी कि यह बिलख आखिरकार माई लॉर्ड तक पहुंच ही गई। इसका एक कारण यह भी था कि ये लपेटे जंगल के दावानल की तरह न केवल यहां , बल्कि विदेशी मीडियां में भी छायी रही, इसलिए इस बार चुप्पी संभव ही नहीं थी। लेकिन इन सब कारणों के इतर परदे के पीछे एक नया कारक था, जिससे न्यायपालिका के तेवर में बदलाव नजर आए, वह था- नए मुख्य न्यायधीश की नियुक्ति।

इस दौरान कुछ बहुत बेहतरीन उदाहरण देखने को मिले, जहां न्यायपालिका ने बता दिया कि हमारी भी पैनी नजरें आप पर गढ़ी हुई और आप हमें नजरअंदाज नहीं कर सकते। मुख्य न्यायधीश के कार्यभार संभालते ही एक दिलचस्प प्रभाव देखा गया कि मुख्य न्यायाधीश ने ऑक्सीजन पूर्ति पर स्वत: संज्ञान मामले को जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बैंच को सौंपा। जस्टिस चंद्रचूड के आदेशों और कार्यवाही को देखते या सुनते समय लगेगा कि सच में एक तार्किक विमर्श अभी भी मौजूद है।जस्टिस चंद्रचूड की पैनी दृष्टि , प्रश्न करने का तरीका, तार्किक और स्पष्ट फैसले तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमेशा आकर्षण का केंद्र रहा है।

जस्टिस चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो जून को 18-44 साल की आयु वालों के टीकाकरण की नीति को कटघरे में खड़ा करते हुए इसे ARBITRARY (मनमाना ) और IRRATIONAL ( तर्कहीन ) बताया। जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस राव और जस्टिस भट की पीठ ने सरकार को टीकाकरण नीति की दुबारा समीक्षा करने को कहा। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि 'जब शासन की नीतियों द्वारा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो हमारा संविधान अदालतों की मूक दर्शक बनने की परिकल्पना नहीं करता है।' यह वो टिप्पणी है, जो संकट में संस्थानों के परख का आधार है। पीठ ने यह भी आग्रह करते हुए कहा कि यह नीति जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार के लिए हानिकारक है।

इससे पहले 31 मई के सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल ने भी लोगों का खासा ध्यान आकर्षित किया। इनमें टीका खरीदने के सभी जरूरी दस्तावेज, विभिन्न नीतियों की फाइल पेश करने, 35,000 करोड़ रुपये के बजट आवंटन के उपयोग का ब्योरा और 18-44 वर्ष की श्रेणी के लिए मुफ्त टीका क्यों नहीं , जैसे सवाल थे।

अब तक सरकार की नीतियों की आलोचना चुनिंदा विपक्ष या एक छोटा तबका कर रहा था,जिसका काउंटर मीडिया और आई टी सेल सफलतापूर्वक कर रहे थे। लेकिन इस बार न्यायपालिका ने भी इन नीतियों को अपने संज्ञान में लिया। किसी सरकार की नीतियों की आलोचना या उस पर प्रश्न लगाने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार से दुश्मनी है, बल्कि लोकतंत्र में यह जवाबदेही का वैध तरीका है। यह एक फीड़बैक की तरह है। इस फैसले से एक महिने पहले (7मई) जस्टिस चंद्रचूड की पीठ की एक और टिप्पणी को आज के दोर में गौर करना महत्वपूर्ण है। यह इसलिए ध्यान देने योग्य है क्योंकि हाल में यह कवायद चल रही है कि सरकार ही सब कुछ है। कोर्ट ने यह अंतर किया। यह टिप्पणी बैंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर केंद्र की याचिका पर कार्यवाही करते वक्त की थी।

एसजी : मुझे लगता है कि अगर हर एचसी(हाईकोर्ट) इस तरह से हस्तक्षेप करता है, तो इससे महामारी प्रबंधन पूरी तरह से पटरी से उतर जाएगा।

जस्टिस शाह : समिति को एक रिपोर्ट के साथ आने में समय लगता है। हम केंद्र की मुश्किलों से वाकिफ हैं। तब एसजी कहते : राष्ट्र द्वारा!

जस्टिस शाह: केंद्र सरकार. राष्ट्र है.( Central Govt. Is nation. )

आगे जस्टिस शाह कहते है कि " मैं आपको एक नागरिक के तौर पर पूछ रहा हूं।" भले ही एसजी साहब ने जस्टिस शाह की टिप्पणी का कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन इस सवाल से कहीं और ले जाने का सीधा मतलब था कि सॉलिस्टर जनरल को लग गया था कि अब अनर्गल दावों की दाल नहीं गलने वाली। जस्टिस शाह की टिप्पणी मीडियां, सरकारी प्रेस कांफ्रेस, प्रवक्ताओं , आई टी सेल और एक बड़ा तबके द्वारा बार-बार जोर देकर खड़े किए गए विमर्श " सरकार ही राष्ट्र है" को ध्वस्त करती है।

ऐसा नहीं है कि केवल सुप्रीम कोर्ट के तेवर ही बदले -बदले से है, बल्कि कई हाईकोर्ट भी तल्ख फैसले और टिप्पणियां करने लगे थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी यह एहसास कराया कि जो नंगा नाच चल रहा है, उस पर उसकी पैनी नजरे गढ़ी हुई है। हाईकोर्ट ने ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह नरसंहार से कम नहीं है" यह टिप्पणी अपने आप में दमदार थी और सरकार तथा व्यवस्थाओं की जवाबदेही तय करने के लिए इससे ज्यादा क्या कहा जा सकता था।

गोवा हाईकोर्ट ने भी नागरिकों की सुध ली। जस्टिस सोनक और जस्टिस साम्ब्रे की पीठ ने ऑक्सीजन वाले मामले में सरकार के बड़े अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि ‘...यदि हम इस तरह लोगों को मरने देते हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।' हाईकोर्ट ने अधिकारियों के माध्यम से सरकार को संकेत कर दिया कि आप इस तरह नागरिकों को मरने के लिए नहीं छोड़ सकते। यहां यह बात दर्ज की जानी चाहिए कि इन विभिन्न हाईकोर्ट की ऐसी तल्ख टिप्पणियों का ही असर था कि कुछ दिन में ऑक्सीजन की पूर्ति बेरोक -टोक और सुचारू रूप से देखी गयी।

गौतम गंभीर पर लगे आरोपों को बचाने में जब संस्थान (भले अनजाने ही सही ) लगी, तो दिल्ली हाईकोर्ट ने तल्ख तेवर अपनाते हुए कहा कि , "हम पहले ही कह चुके हैं कि यह गलत चलन है। हालात का फायदा उठाना और फिर एक मददगार की तरह खुद को पेश करना, जबकि समस्या खुद उनकी ही खड़ी की हुई होती है, लोगों की ऐसी प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना होनी चाहिए। उसके बाद भी व्यक्ति फिर से यह कहता है कि वह उस काम को दोबारा करेगा। यदि ऐसा जारी रहता है तो हम जानते हैं कि इससे हमें कैसे निपटना है।" गंभीर पर फैबीफ्लू दवा की कालाबाजारी के आरोप लगे थे। फैबीफ्लू एक एंटीवायरल दवा है, जिसका इस्तेमाल कोरोना संक्रमण के हल्के और मध्यम लक्षणों वाले मरीजों के उपचार में किया जा रहा है। जब गंभीर ने इसके कई किट बांटे थे,तब दिल्ली में इसकी भारी किल्लत थी।

थॉमस जेफ़र्सन का कहना था कि "जब लोग अपनी सरकार से डरने लगे ,तो वो शासन निरंकुश है। जब राज सत्ता अपने नागरिको से डरती हो तो वहां स्वतंत्रता है।"

हमारे यहां पहले लोग सरकारों से डरते नहीं थे। पेट्रोल की कीमतों पर सड़के जाम होती देखी है। अन्ना आंदोलन ने पूरे देश को अपने में शामिल किया था। फिर यह बदलाव कैसे हुआ? यह हुआ मीडिया से। वे राष्ट्र की बजाय सरकार की इस हद तक भक्ति में लीन हो गए कि सरकार की किसी भी बात का मनगढंत कुतर्कों से बचाव आसानी से करने लगे। इस दौरान मीडिया के मूल्य और नियम होते भी है, ये भी भूल बैठे। अखबारों की कतरने सरकारी विज्ञापन ज्यादा लगने लगी। लोकतंत्र को भी खिलौना बना बैठे। यह लोकतंत्र के चौथे खंभे की हार थी। यह हमारी हार थी। यह लोक के अस्तित्व की हार थी।

इन सब संदर्भों में न्यायपालिका की उपरोक्त टिप्पणियां ऐतिहासिक मील की तरह दिखती है। जो काम न्यायलय से पहलेमीडियां को करना था ,वह काम इस बार न्यायलय ने किया। जस्टिस साहब ने कोई खास नहीं किया , केवलअपनी रगों में बहते संविधान की व्याख्या मात्र की। सरकार की नीतियों कोकटघरे में खडा कर , सरकार की जवाबदेही तय की। यह बताता हैकि केवल सकारात्मकता से कामनहीं चलने वाला ,बल्कि जब जरूरी हो, तब वहां सवाल खड़े किए जाये, जिससे सरकार की नीतियां ज्यादा जनहितैषी बन सके। न्यायपालिका ने मात्र यह याद दिलाया कि हम भी आपकी तरह ही एक संस्थान है और हम देख भी रहे है...

296 views2 comments