कोविड़ 19 : नजरअंदाज होते हाशियाई वर्ग के दर्द को दर्ज किया जाए

COVID-19 से आर्थिक रुप से जो झटका भारत सहित तमाम अन्य अर्थव्यवस्थाओं को लगा है, उससे लगभग हम सब वाक़िफ होने लगे है। इसके अलावा कैसे इस महामारी ने आम इंसान को परेशान किया है, इससे भी हम सब भलीभांति परिचित है। इस महामारी के दौरान या इसके परिणामस्वरूप कुछ गंभीर समस्याएं उपजी, जिन्होंने सामाजिक परिवेश को व्यापक तौर पर प्रभावित किया। इन विभिन्न पहलुओं को हम अज्ञानवश या अरुचिकर समझकर मुंह मोड़ रहे है।

पिछले साल मार्च 12 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोरोना को महामारी घोषित किया था, तब से मात्र कुछ दिनों में ही लगभग ज्यादातर देशों ने लॉकडाउन जैसे कठोर निर्णय की घोषणा कर दी थी। हमारे देश भारत में भी 24 मार्च के बाद से ही संपूर्ण लॉकडाउन लग गया था। पूरा देश पूरे तीन महीनों के लिए बंद रहा।

इस अप्रत्याशित लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित होने वालों में एक धड़ा उन मज़दूरों का था,जो अपने गांव या शहर छोड़ कर दूसरे शहरों में काम करने जाते थे। इनमें बड़ी आबादी उन मजदूरों की थी, जो दिहाडी़ कामगर थे। इनकी परेशानियों को कितने भी शब्द अर्पित कर दूं, पूरी तरह ब्यौरा नहीं दे सकता। जितनी भी टीवी पर रिपोर्ट चली उनका भी बखान कर लूं, तो भी मजदूरों की समस्याओं को पूर्णता से बया नहीं किया जा सकता। फरवरी में दिल्ली चुनाव और ट्रंप के स्वागत में लीन सरकार ने मार्च में लॉकड़ाउन लगाने से पहले संकेत तक नहीं दिए। आश्चर्य तो तब होता है, जब वह पूरे जोर शोर से महामारी को नकारती रही। और यकायक लॉकड़ाउन की घोषणा नोटबंदी की तरह हो गयी। इस अचानक से आन पड़ी विपदा में कई लोगों को हजारों किलोमीटर तक पैदल चलकर अपने घर जाने को विवश होना पड़ा था। इस दौरान एक तबका तो रास्तों में भूख, प्यास और दुर्घटना के चलते दुनिया से चल बसा। वे हालात काफ़ी दर्दनाक थे। जो शहरों में रूके रहे, वे भी खाने - पीने के लिए संघर्ष करते नजर आए। मजदूरों की खाने की लाईन में कतारें आम बात थी। दूसरा प्रभाव आधी आबादी पर पड़ा। सबका सामाजिक जीवन जब चार दिवारी में कैद हो गया तो महिलाओं पर शोषण में तीव्रता से बढ़ोतरी होने लगी। एक तो घर का सब काम करने का जिम्मा भी अधिकांश घरों में महिलाओं पर ही था, वहीं अब उनका भार तेजी से कई गुना बढ़ने लगा।

दूसरी तरफ आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रुप से परेशान लोग अपनी भड़ास भी महिलाओं पर (खासकर शारीरिक रूप से कमजोर ) निकालने लगे। हमारे समाज का गठन ही महिलाओं के लिए भेदभाव का आधार है। महिलाओं की कम उम्र को वरीयता दी जाती है, जिससे पति को ज्यादा उम्र का मनोवैज्ञानिक फायदा मिलता है। वह अपनी धौंस का ढ़िढोरा जब चाहे जमा सकता है। महिलाओं के साथ पहले भी अत्याचारों के उदाहरण ज्यादातर घरों में मौजूद थे, और उसको एक बार फिर इस लॉकड़ाउन ने नया रूप दे दिया। महिलाओं पर ज्यादतियों तेजी बढ़ गयी। इन ज्यादतियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतनी पाबंदियों के बावजूद दर्ज शिकायतें पिछले छः वर्ष में सबसे अधिक है। एक और भयानक चीज देखने को मिली, वह थी बाल मज़दूरी में तेजी वृद्धि। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट का दावा है कि विश्वभर में बाल मज़दूरों की संख्या 16 करोड़ से ज्यादा हो गई है। इसमें तीव्र बढ़ोतरी के भी संकेत है, क्योंकि संकट अभी थमा नहीं है।

बाल मज़दूरी हमारी एक गम्भीर समस्या रही है। आधुनिक भारत के नीति निर्माता इससे देश के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव से भली-भांति वाक़िफ थे, इसलिए आजादी के बाद प्रभाव में आए हिन्दुस्तान के अपने संविधान में बाल मजदूरी पर रोकथाम की व्यवस्था की। लेकिन संविधान में लिखी हर बात का अगर धरातल पर असर दिखाई पड़ जाए तो इस २१वी सदी में किसी को इस देश को विश्वगुरु बनाने के सपने नहीं दिखाने पड़ते। खैर यह एक अलग मसला है कि कैसे तमाम कायदे- कानून होने पर भी कई जगहों पर बाल मजदूरी काफ़ी समय तक दिखती रही। संगठित और सरकारी क्षेत्र में इसका कोई रुप आपको दिखाई नहीं देगा, लेकिन असंगठित क्षेत्र में काफ़ी समय से ये पहलू समस्या बना हुआ है। बाल मज़दूरी के पीछे भी कई ऐसे कारण है, जो इसकी विवशता को दिखाते है। इनमें अनाथ हुए बच्चे, आर्थिक तंगी के ऐतिहासिक दौर से गुजर रहे परिवारों की संताने और तमाम तरह के कई ऐसे कारण जो समाज की ऐतिहासिक - आर्थिक असमानता को दिखाते है। भारत सरकार ने इस दिशा में कई ऐसे कार्य किए है , जो ऐसे तमाम समस्याओं से निजात दिलाने की कोशिश करते है। मिड डे मील योजना एक मील की तरह थी। कई समाजसेवी लोगों ने भी इस चंगुल से निकालने में काफ़ी बच्चों और परिवारों की मदद की। कैलाश सत्यार्थी जी का नाम उनमें से एक है, जिनको इसके वजह से ही नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। सरकार और अन्य NGOs की सहायता से काफ़ी हद तक बाल मजदूरी के उन्मूलन हो रहा था।


अब मज़दूरों के घर के छोटे लड़के जो पहले ही गरीबी के एक बड़े दुष्चक्र में फंसे हुए थे, अब बाल मजदूर के रूप में काम करने लगे। ज्यादातर होटल, ढाबा, और अन्य छोटे कारखानों में यह साफ देखा जा सकता है। इनमें से ज्यादातर स्कूल जाते नहीं थे, लेकिन अब शिक्षा क्षेत्र के ठप हो जाने से अभिभावकों का दबाब भी प्रत्यक्ष रूप से बढ़ गया, क्योंकि कई लोगों के अभिभावक भी अपने काम से हाथ धो बैठे।

बाल मजदूरी बच्चों से न केवल उनका स्वतंत्र बचपन, शिक्षा का अधिकार ही छीनती है , साथ ही उनको कार्यस्थल पर होने वाले सेक्सुअल छेड़छाड़ की तरफ धकेल देती है। कोरोना महामारी का बेरोजगारी पर भी भारी उछाल देखा गया। एक चुनौतिपूर्ण समस्या को ना केवल पुनर्जीवित किया बल्कि उस हद तक पहुंचा दिया, जिसके आने वाले समय में गंभीर सामाजिक- सांस्कृतिक प्रभाव देखने को मिलेंगे। यह संकट जल्दी ही काबू में नहीं आने वाला। जब कोरोना वायरस के वैश्विक महामारी घोषित होने के साथ ही दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं ठप हो गई, तो कुटीर उद्योग से लेकर बड़े उद्योगों तक सभी की गति अवरूद्ध हो गयी। इसने मज़दूरों को उद्योग से बाहर निकालने का रास्ता साफ किया। उद्योग के लिए लाभ पहली प्राथमिकता होती है। इसका एक ही तरीका है मजदूरों की कमी या मजदूरी को घटा दो। लागत में कमी की इस कवायद ने कई परिवारों को सडक पर ला दिया। मालिकों ने पहले तो अपने श्रमिकों की संख्या कम की, फिर उनकी तनख्वाह भी कम कर दी गई और यहां ही नहीं रूके, उन्होंने बाल मजदूरों को प्राथमिकता दी , ताकि लागत में कमी की जाए। इस तरह महामारी की सख्त पाबंदियों ने कई वर्गों पर बुरा प्रभाव डाला। कई लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए, तो कई नौकरी से हाथ धो बैठे। और लाखों वायरस की चपेट में आ गए। पहले लहर में बचने वाले ग्रामीण इलाकों में कोविड-19 की दूसरी लहर ने ऐसा कहर बरपाया है कि बहुत से परिवार इससे घोर गरीबी के दुष्चक्र में फंस गए है। ऐसे बहुत से वर्ग है, जिनका दर्द दर्ज नहीं हुआ। कई लोगों की पीड़ाओं को समाज ने अनदेखा कर दिया।

कई रिपोर्टों ने दावा किया है कि कोरोना काल में पूंजीपतियों की संपति में व्यापक उछाल देखा गया। वहीं दूसरी तरफ कोरोना की मार से गरीबों की हालात बदतर हुई, तो जो हाशिए पर थे, इनकी हालात भी खराब हुई। कई वर्गों पर इतना गंभीर प्रभाव पड़ा है कि लोग अपनी छोटी-छोटी जरुरतें भी पूरी नहीं कर पा रहे है। लेखक किरोड़ीमल महाविद्यालय में तृतीय वर्ष का छात्र है। (डिस्क्लेमर : इस लेख के विचार पूर्ण रूप से लेखक के है।)


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