समाज के कण-कण में भाषा, भाषा में झलकता है समाज

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसका भाषा से गहरा संबंध है, क्योंकि समाज के अस्तित्व को भाषा ही संभव बनाती है। यह एक सामाजिक संपत्ति है। दूसरी तरफ भाषा का भी समाज से गहरा लगाव होता है। समाज के अभाव में भाषा कल्पनातीत है। भाषा और समाज एक दूसरे पर आश्रित है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व अधूरा है।





‘समाज’ शब्द किसी देश अथवा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के ऐसे समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिनके साझे रीति-रिवाज, कानून और व्यवस्थाएं हैं, जहाँ सभी व्यवस्थित ढंग से साथ मिलकर रहते हैं और यह निर्णय लेते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए और किए जाने वाले कार्य को वे परस्पर मिल बाँटकर करते हैं। समाज को किसी भूभाग, देश अथवा इलाके विशेष में रहने वाले सभी लोगों के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि समाज का एकीकृत चरित्र होता है। समाज विभिन्न लोगों से मिलकर बनता है, किंतु उसकी कुछ समान विशेषताएं और अविभाज्य उद्देश्य होते हैं। उस समाज की भाषा/भाषाओं में वहाँ के कार्यकलाप, सोच-विचार, अनुभव, आकाक्षांए, सुख-दुख की अभिव्यक्ति का स्वरूप मौजूद रहता है। उसकी शब्दावली, कथन-शैली, लहजा और भंगिमाएं उन लोगों के जीवन जीने, महसूस करने, अभिव्यक्त करने के तौर तरीकों से निर्मित होती है। समाज की संस्कृति उस भाषा में अभिव्यक्ति पाती है। ‘भाषा’ किसी भी समाज के लिए एक वरदान है।



भाषा से तात्पर्य मनुष्य की वागेंद्रियों द्वारा उच्चरित ध्वनियों से है। जिसका प्रयोग समाज में करते हैं। संस्कृत धातु ‘भाष्’ से व्युत्पन्न ‘भाषा’ के लिए विश्व की कुछ प्रमुख भाषाओं में विभिन्न नामों का प्रयोग किया जाता है। यथा – अंग्रेज़ी में इसे ‘लैंग्वेज’ (Language) कहते हैं, रूसी में ‘यजिक’, फारसी में ‘जबान’ तथा उर्दू में ‘ज़बा’ कहते हैं। विद्वानों ने ‘आत्मा की अव्यक्त’ ध्वनि रहित और मूक बातचीत को ‘विचार’ माना है, परंतु यही भाव ध्वनियों से संपृक्त होकर जब होठों पर व्यक्त होता है, तब वह ‘भाषा’ नाम से अभिमांडित होता है। व्याकरणाचार्य श्री कामता प्रसाद गुरु का कहना है कि “भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्टतया समझ सकता है।” कुल मिलाकर भाषा भाव का पारदर्शी रूप हैं। यह मनुष्य की रचनात्मक यात्रा का प्रमुख संसाधन हैं। भाषा मानव मन में होने वाली एक सहज प्रक्रिया है।


भाषा को किसी समाज के सदस्यों के बीच परस्पर संपर्क तथा संवाद का माध्यम माना गया है। संपर्क और संवाद के बिना किसी समाज का अस्तित्व ही संभव नहीं है। भाषा समाज की एक सीधी सरल रेखा में चलने वाली सपाट इकाई नहीं है। समाज तथा इसके सदस्यों के अस्तित्व और चरित्र के अनेक आयाम होते हैं और इन सभी आयामों के संदर्भ में भाषा की विशिष्ट भूमिका होती हैं। मानव के मौखिक संवाद ही नहीं, सोच-विचार का माध्यम भी भाषा ही होती है। केवल गहन दार्शनिक विचारणा या चिंतन के लिए नहीं बल्कि छोटी से छोटी बातों या सोच के लिए भी उसे भाषा का सहारा लेना पड़ता हैं। जैसे बारिश की बौछार से बचने के लिए जब किसी मनुष्य का मस्तिष्क उसे किसी ओट की तलाश करने का निर्देश देता है, तो वह उसके अंतर में निहित भाषा के माध्यम से ही होता है, भले ही उसे सचेत रूप से इस बात का भान न हो । अतः भाषा मात्र सामाजिक व्यवस्था नहीं, व्यक्तिगत आवश्यकता भी हैं। यह हमारे जीवन का अनिवार्य और अभिन्न अंग है।


भाषा एक सामाजिक यथार्थ है, जो व्यक्ति को उसके समाज से जोड़ती है और उसकी सामाजिक अस्मिता का निर्धारण करती है। आचार्य भर्तृहरि ने तो भाषा को संपूर्ण विश्व समाज को एक में जोड़ने वाली ‘निबंधनी’ अर्थात् विश्व को मिलाने वाली कहा है। वह ‘राष्ट्री’ (राष्ट्र निर्मात्री) और ‘संगमनी’ (संबद्ध करने वाली) है- “अहं राष्ट्री संगमती वसूनाम।” ; “शब्देष्वेवासिता शक्ति र्विंश्वस्यास्थ निबंधनी”। अतः सबसे पहले भाषा अपने आप को पहचानने का साधन है। अगर किसी समाज को उसकी भाषा से काट दिया जाए तो हम उसकी अस्मिता को खंडित कर देते हैं। भाषा को हम सामाजिक समन्वय सूत्र कह सकते हैं।

भाषा एक समग्र संस्कृति की आत्माभिव्यक्ति का साधन है, लेकिन उसके साथ-साथ वह स्वरूप रक्षा का भी एक साधन है। समाज के साथ जब हम भाषा को जोड़ते हैं, तो उसकी युगधर्मिता की ओर ध्यान देते हैं। हमारे सारे सामाजिक व्यवहार का आधार भाषा है, और भाषा है भी सामाजिक व्यवहार के लिए, इसी के आधार पर व्यक्ति अपने समाज और संस्कृति के भीतर रहता है। उसका बौद्धिक और भावनात्मक विकास भी भाषा के द्वारा होता है। भाषा के बिना व्यवहार नहीं हो सकता और जिस भाषा का व्यवहार नहीं हो सकता या जिस भाषा का व्यवहार से संबंध नहीं है, वह भाषा समाज से भी टूट जाएगी। इसलिए जब पूरी संस्कृति का अवमूल्यन होता है, तो समाज का अवमूल्यन होता है और अंततः भाषा का भी अवमूल्यन होता है। यही कारण है कि अरबी, संस्कृत और अफ़गानी आदि भाषाएं अब इतनी लोकप्रिय नहीं रही हैं।


हर भाषा का अपना एक अलग समाज होता है, जहां वह प्रयुक्त होती है अतः सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के प्रभाव से शब्दों में विशेष अर्थ विकसित होता है, जिसे सामाजिक अर्थ भी कहा जाता है। जैसे: ‘तू', ‘तुम’ और ‘आप’ का व्याकरण की दृष्टि से प्रयोग एक ही अर्थ में होता है, लेकिन इनके सामाजिक अर्थ अलग-अलग है। सामाजिक स्तर में और आयु में बड़े-छोटे व्यक्तियों की भिन्नता से इनके अर्थ में अंतर आ जाता है।

भाषा एक सामाजिक क्रिया के रूप में ही हमारे बीच काम करती है। भाषा के अभाव में मनुष्य अधूरा और अपंग हो जाता है। व्यक्ति एवं समाज के विकास हेतु भावों और विचारों का संप्रेषण अत्यंत आवश्यक है। भाषा समाज-सापेक्ष, ध्वनिमूलक सार्थक व्यवस्था होने के साथ-साथ समाज में पारस्परिक संप्रेषणीयता का सबसे प्रबल और पूर्व माध्यम होती है। भाषा और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। परिवेश के आधार पर हर भाषा अपना रूप विकसित करती है और अपनी अलग पहचान बनाती है। उदाहरण के लिए हिंदी भाषा-समाज और अंग्रेजी भाषा-समाज दो भिन्न भाषा समाज है। दोनों भिन्न परिवेशों में विकसित भाषाएं हैं। हिंदी भाषा-समाज नाते-रिश्तों के हर संबंध को महत्व देता है, इसलिए हिंदी में हर रिश्ते के लिए भिन्न-भिन्न शब्द है- मौसी, बुआ, ताई, चाची, मामी आदि। जबकि अंग्रेज़ी भाषा-समाज में हर संबंध के लिए महत्वपूर्ण शब्द नहीं है, वहां हिंदी के इन भिन्न शब्दों के स्थान पर एक शब्द “aunt” (आंट) का ही प्रयोग होता है।


स्पष्टत: भाषा, समाज की संरचना के अनुरूप अपना आकार ग्रहण करती है। यहां तक कि किसी भाषा की संरचना को देखकर हम उस समाज की संरचना का अनुमान भी कर सकते हैं। भाषा एक सामाजिक क्रिया रूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है।


समाज, संस्कृति की किसी एक युग से आबद्ध अवस्था का नाम है। संस्कृति एक व्यापकतम रूप है और समाज उसका एक समय से बंधा हुआ रूप है। संस्कृति एक दीर्घकालिक ढांचा है, जिसके भीतर हमारे समाज की भावनाएं आकार लेती हैं। समाज के साथ भाषा का संबंध भी इसी संदर्भ के भीतर निहित है। इस संदर्भ में ‘अज्ञेय' का मानना है कि- “जैसे समाज कहने पर मैं संस्कृति की समग्र और सतत प्रक्रिया के किसी एक देश काल में बंधे हुए रूप को सामने लाता हूं, उसी तरह समाज के साथ जब भाषा को जोड़ता हूं तो उसकी भी उसी काल सीमा के भीतर की अवस्था पर विचार करता हूं।”


मनुष्य का भाषा-प्रेम समाज सापेक्ष होता है और उसकी भाषा समाज के भीतर ही प्रभावी होती है। समाज में रहते हुए भाषा के बिना मनुष्य की कोई गति नहीं होती है। भाषा ही मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है और यह भी सत्य है कि भाषा के सहयोग से ही समाज का निर्माण होता है। भाषा चाहे जो भी हो उसका सदैव एक दुहरा चरित्र होता है। भाषा संप्रेषण का सशक्त माध्यम होने के साथ ही संस्कृति की संवाहक भी होती है। उदाहरण के लिए अंग्रेज़ी भाषा, जो ब्रिटेन, स्वीडन और डेनमार्क में बोली जाती है। लेकिन खासकर स्वीडन और डेनमार्क के लोगों के लिए यह गैर-स्कैंडेनेवियाइयों के साथ बातचीत अथवा संप्रेषण का एक साधन मात्र है। यह उनकी संस्कृति की भाषा नहीं है जबकि ब्रिटेन के नागरिकों के लिए यही अंग्रेज़ी उनकी बातचीत, संस्कृति और इतिहास की भी संवाहक भाषा है।


संस्कृति और भाषा से ही मनुष्य के सामाजिक स्तर का पता चलता है। बिना समाज के संस्कृति की सत्ता असंभव है और भाषा संस्कृति की सत्ता के लिए एक अनिवार्यता है। भाषा संस्कृति के अनुरूप ही बनती और संवरती है। समाज और संस्कृति का महत्व भाषा के संदर्भ में ही स्थापित होता है और भाषा का प्रयोग हमें समाज और संस्कृति की संरचना का परिचय देता है।


समाज से दूर रखे गए बच्चे समाज विशेष की भाषा से भी दूर हो जाते हैं। विद्वानों का मानना है कि भाषा और समाज में निरंतर घात-प्रतिघात होता रहता है और इस प्रक्रिया में भाषा और समाज दोनों ही एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। भाषा में केवल भाषिक संरचना ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना भी समाहित होती है। इस प्रकार भाषा समाज को और समाज भाषा को परस्पर प्रभावित करते हुए आगे बढ़ते हैं।


भाषा में सर्जनशीलता का गुण होता है। कई समाज ऐसे होते हैं, जिनमें सर्जनशीलता का स्थान ऊंचा होता है और कई समाज ऐसे भी हैं, जो कि एक खास तरह की मानसिक जड़ता, गति का अभाव तथा सर्जनशीलता को विलासिता समझते हैं। यह इसलिए कि भाषा के मामले में सर्जनशीलता के प्रति एक संदेह का भाव है। जिस परिस्थिति में हम जीते हैं, उसमें हमें निरंतर ध्यान रखना चाहिए कि पूरा समाज जिस भाषा के साथ जीता है, उसमें और उसके साथ जीते हुए अगर हम उस जीवन संदर्भ को पहचानते हैं और उस भाषा में रचना करते हैं, तो हमारा समाज भी रचनाशील हो सकता है। भाषा हमारी शक्ति है, उसको हम पहचाने- वह रचनाशीलता का उत्स है, व्यक्ति के लिए भी और समाज के लिए भी।


भाषा का अपना समाजशास्त्र होता है। कभी भाषा समाज को परिभाषित करती हैं, तो कभी समाज भाषा को। समाज की प्रत्येक गतिविधि भाषा के माध्यम से तय होती है। हम अपने प्राचीन काव्य एवं परंपराओं का अवलोकन करें, तो भाषिक स्तर पर समाज बंटा मिलेगा। भाषा का समाजशास्त्र ही इस बात का जवाब दे देगा कि मागधी, प्राकृत के साथ संस्कृत आचार्यों ने सौतेला व्यवहार क्यों किया। इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि आखिर संस्कृत नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्र इसका प्रयोग क्यों करते हैं? संस्कृत नाटकों में मां प्राकृत बोलती है, बेटा संस्कृत बोलता है। लिंग के आधार पर किसी समाज की भाषा नहीं बदलती है। वस्तुतः वर्ण व्यवस्था के आधार पर भाषा को आरोपित किया गया है। प्राकृत निम्न श्रेणी के पात्रों पर ऊपर से थोपी गई है। इसलिए यह भाषा कृत्रिम है। भोजपुरी का समाज यह नहीं मानता कि वह भी उसी की कोख से पैदा हुई है। भोजपुरी कृषि एवं श्रम संस्कृति की भाषा है। भोजपुर में माटी की सोंधी गंध है। यह मेहनतकशों और कामगारों, किसानों और मज़दूरों की भाषा है। समाज की हर झलक सुख, दुख, पीड़ा, अवसाद, गति, मूल्यों से संश्लिष्ट संस्कृति भाषा में बोलती है।


इस हम देखते हैं कि भाषा और समाज का एक अटूट संबंध है। भाषा न केवल व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, बल्कि उसे एक पहचान भी दिलाती है। वह न केवल पशु और मनुष्य में अंतर करती है, बल्कि उसके समाज के संचालन का माध्यम भी होती है। भाषा की प्रकृति में ही सामाजिक तत्व अंतर्निहित रहते हैं। समग्र रूप से भाषा, समाज और संस्कृति परस्पर अभिन्न रूप से संबद्ध होते हैं और यदि इनमें से कोई एक भी तत्व कमज़ोर हो तो विकास के इस महाकुंभ में वह समाज पिछड़ जाएगा।