सवालों के घेरे में लक्षद्वीप का विकास


भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित ‘हम भारत के लोग’ और ‘लोकतांत्रात्मक गणराज्य' शब्द लोकतंत्र की मजबूत का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन शब्दों का अर्थ हमें तब समझ में आता है, जब शासक वर्ग जन के विरोधी तंत्र बनाने का प्रयास करते हैं। और समय पर समझ आना भी चाहिए। आखिर शासक वर्ग भी तो जाने की हम कहां तक लोकतंत्र की सीमा पार कर रहे हैं ? यह समय-समय पर शासक वर्ग को अहसास दिलाना जरूरी है, जिससे वे संविधान सम्मत काम कर सके। हाल में भारतीय क्षेत्र के दक्षिण-पश्चिम लक्षद्वीप में विकास के नाम पर जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जनतंत्र की दुआई देकर लोगों द्वारा विरोध किया जा रहा है। यह विरोध कुछ नियमों के खिलाफ है, जो वहां के प्रशासक द्वारा लाए गए हैं। इसी वजह से लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल खोड़ा पटेल को हटाने की मांग हो रही है। जब एक प्रशासक को जनता द्वारा हटाने की मांग हो तब यह प्रश्न ज्यादा विचारणीय हो जाता है। उनके द्वारा लाएं गए नियमों में असामाजिक गतिविधियों करने पर जेल, लोगों से जमीन छिनना और शराब की बिक्री को मंजूरी आदि है। यह नियम भले ही सामान्य लगे, परन्तु आन्तरिक रूप से ये लक्षद्वीप की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है। इसके विरोध की गूंज पूरे भारतवर्ष में उठी है।





सवाल यह है कि क्या यह बवाल मात्र है? क्या यह जनता की जागरूकता है या सिर्फ खोखला विरोध है? लक्षद्वीप भारतीय क्षेत्र के आठ केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे छोटा है, जिसका