सुनने की शक्ति बची है ?

Updated: Apr 4

''एक बार जहाज में जब बैठा तो मेरे बगल में एक बहनजी बैठी हुई थी। मैंने उनको देखा तो नीचे गमबूट थे। जब और ऊपर देखा तो घुटने फटे हुए थे...और दो बच्चे साथ में दिखे। पूछने पर पता चला कि पति जेएनयू में प्रोफेसर है और वो खुद कोई एनजीओ चलाती है। जो एनजीओ चलाती है, उनके घुटने दिखते है, समाज के बीच में जाती हो….क्या संस्कार दोगी?''





ये बयान बाल अधिकार संरक्षण आयोग की कार्यशाला में उत्तराखंड के माननीय मुख्यमंत्री श्री रावत ने दिया। श्री मुख्यमंत्री को महिला की रिप्ड (कटी हुई डिजाइनिंग वाली ) जींस में संस्कारों की अवेहलना दिखी। महिला क्या पहनेगी और कैसा पहनेंगी, इसको नियंत्रित करने की, यह पहली कोशिश नहीं है। अब यह नेताओं या बडेे़ पद पर बैठे लोगों की स्वाभाविकता बन गया है कि खुले आम महिलाओं पर भद्दी टिप्पणी से वो जरा भी नहीं संकुचते।


इन तमाम कोशिशों की जड़े हमारे अतीत के पितृसतात्मक पक्ष में है। हमारे समाज में सदियों से पितृसता की दोगली परंपराएं हावी रही। इसने ऐसी बेडियां पैदा की ,जिससे महिलाओं को नरकीय जिंदगी जीने को विवश किया गया। इन अवशेषों का आज भी इतना गहरा प्रभाव है कि कई महिलाएं (खासकर ग्रामीण इलाकों में) अभी भी अपने हित की बजाय परंपराओं के नाम पर दबना स्वीकार कर लेती है। और जो दबना पसंद नहीं करती उनका क्या हश्र होता है, आपको हाल के दो उदाहरण से बताता हूं - तीन सप्ताह पहले की घटना है। राजस्थान में एक लड़की अपने प्रेमी के साथ चली गयी। जोडे के द्वारा सुरक्षा मांगने पर कोर्ट ने सुरक्षा भी मुहैया करायी। लेकिन लड़की के घरवाले पहले लड़के के घर से जबरन बच्ची उठा लाए, और फिर बाप ने बेटी को अपने ही हाथ से मार डाला। दूसरी घटना उत्तर प्रदेश से है। लड़की के पापा ने सिर्फ इसलिए लड़की को