सुनने की शक्ति बची है ?

Updated: Apr 4, 2021

''एक बार जहाज में जब बैठा तो मेरे बगल में एक बहनजी बैठी हुई थी। मैंने उनको देखा तो नीचे गमबूट थे। जब और ऊपर देखा तो घुटने फटे हुए थे...और दो बच्चे साथ में दिखे। पूछने पर पता चला कि पति जेएनयू में प्रोफेसर है और वो खुद कोई एनजीओ चलाती है। जो एनजीओ चलाती है, उनके घुटने दिखते है, समाज के बीच में जाती हो….क्या संस्कार दोगी?''





ये बयान बाल अधिकार संरक्षण आयोग की कार्यशाला में उत्तराखंड के माननीय मुख्यमंत्री श्री रावत ने दिया। श्री मुख्यमंत्री को महिला की रिप्ड (कटी हुई डिजाइनिंग वाली ) जींस में संस्कारों की अवेहलना दिखी। महिला क्या पहनेगी और कैसा पहनेंगी, इसको नियंत्रित करने की, यह पहली कोशिश नहीं है। अब यह नेताओं या बडेे़ पद पर बैठे लोगों की स्वाभाविकता बन गया है कि खुले आम महिलाओं पर भद्दी टिप्पणी से वो जरा भी नहीं संकुचते।


इन तमाम कोशिशों की जड़े हमारे अतीत के पितृसतात्मक पक्ष में है। हमारे समाज में सदियों से पितृसता की दोगली परंपराएं हावी रही। इसने ऐसी बेडियां पैदा की ,जिससे महिलाओं को नरकीय जिंदगी जीने को विवश किया गया। इन अवशेषों का आज भी इतना गहरा प्रभाव है कि कई महिलाएं (खासकर ग्रामीण इलाकों में) अभी भी अपने हित की बजाय परंपराओं के नाम पर दबना स्वीकार कर लेती है। और जो दबना पसंद नहीं करती उनका क्या हश्र होता है, आपको हाल के दो उदाहरण से बताता हूं - तीन सप्ताह पहले की घटना है। राजस्थान में एक लड़की अपने प्रेमी के साथ चली गयी। जोडे के द्वारा सुरक्षा मांगने पर कोर्ट ने सुरक्षा भी मुहैया करायी। लेकिन लड़की के घरवाले पहले लड़के के घर से जबरन बच्ची उठा लाए, और फिर बाप ने बेटी को अपने ही हाथ से मार डाला। दूसरी घटना उत्तर प्रदेश से है। लड़की के पापा ने सिर्फ इसलिए लड़की को मार ड़ाला क्योंकि वह जिस लड़के को डेट कर रही थी, वह पिता को पसंद नहीं था।


हम ऐसे मामले हर साल हजारों की संख्या में देखते है, जहां लड़कियां कभी अपने परिवार की इज्जत , तो कभी किसी पुरूष की ईगो और कभी आपसी रंजिशों का शिकार होती है। होता सिर्फ यह है हम संवेदनशील मुद्दों पर दो दिन की ट्विटर ट्रैंड़ और कुछ लोगों के स्टेटस के बाद बात आयी - गयी कर लेते है। हद तो तब हो जाती है, जब एक मुद्दा उठाया जाता है और तब इसके समान्तर सोशल मीडिया (खासकर ट्विटर ) पर आईटी शेल उसके विरूद्ध दूसरा फेक केस लेकर आ जाती है। इस तरह हम रोज महिलाओं पर तीव्रता से बढ़ रहे उत्पीडन ,सामूहिक दुष्कर्म, नृशंस हत्या के मामलों का सामान्यकरण कर रहे है। और इन सबमें व्यवस्थाओं का तो पूछिए ही मत। क्या रवैया है! दाद देनी पडेे़गी। हाथरस जैसे कई मामले इसके साक्षी है, जहां व्यवस्थाएं दोषियों के साथ हो गयी या पीडिता को ही परेशान करने लगी। अपने न्यायधीश साहब के सुझाव को तो नारीवाद के इतिहास में अंकित कर देना चाहिए। साहब ने बलात्कर के आरोपी से ही पूछ लिया कि क्या आप पीडिता से विवाह करेंगे? यॉर ऑनर न्याय कर रहे थे या समझौता?


इन सब के सामान्यकरण के चलते ही ऐसी घटनाओं में कमी आना तो दूर उल्टा कई गुना बढ़ोतरी हो रही है। तभी तो कोई भी नेता या बड़े औहदें पर बैठा व्यक्ति कुछ भी बक देता है। यह पितृसतात्मक वर्चस्व कायम रखने की कवायद ,जिसमें कुछ भी हो जाए परन्तु बड़े नेता, अधिकारी, व्यवस्थाएं(ऊपर के केस में तो न्यायलय भी) और आम लोग हर प्रकार से महिला को दोषी ठहराने की कोशश करते है। वह सार्वजनिक जीवन में क्या पहनती थी, क्या उसने छोटे कपडेे़ तो नहीं पहने थे, वह कैसे बोलती थी और सबसे खतरनाक एक हाथ से ताली नहीं बजती जैसे लफ्फाजी तर्कों से बलात्कारियों को बचाने की कोशिशें चलती है। इन कुतर्कों से ही ऐसी घटनाओं को प्रोत्साहन मिलता है। इसका परिणाम हम देख पा रहे है कि मानव दिन पर दिन खतरनाक राक्षस में बदलता जा रहा। हर अगले दिन एक अपराधी से श्रेष्ठ अपराधी हमारे सामने प्रविष्ट करता है ,जैसे उनमें विभीत्स और नृशंस कारनामें करने की होड़-सी लगी हो।


हम दोगले समाज में रहते है। हमारा समाज मंदिर में दैवी की प्रतिमा को नतमस्तक होकर घर - समाज में आकर उसी के प्रतिबिंब (औरत) पर गालियों का अंबार लगा देने वाला है। यहां स्त्री-केन्द्रित गालियां बड़े छांव से बोली जाती है, भले ही गलती पुरूष की हो ; गाली में तो महिला को घसीटकर ले आयेंगे। हमारे आसपास कई ऐसे लोग है, जिनको हम आंख मूंद कर अक्सर नजरअंदाज करते है। अगर आपको इनका नमूना देखना है, तो आप एक काम कीजिए। आप गौर से अपनी टाइमलाइन, अखबार, न्यूज चैनल देखिएगा , आप हैरान रह जायेंगे कि सालभर किसी ना किसी औरत को बिना जुर्म साबित हुए समाज का एक बड़ा तबका भिन्न - भिन्न टैग उनसे जोड़ देता है। इसमें बड़े-बड़े नेता और विद्वान तक नहीं चूकते। समाज में ऐसा वर्ग मौजूद है, जो अपनी बहिन या बेटी को किसी के हंसने पर थप्पड़ जड देता है, शहर में पढ़ने जाने का विरोध करता है, और लडकी के प्रेम में पडने पर उसको मार तक देता है।



यदि इनमें से ही कोई आगे जाकर अधिकारी बनकर अपनी पत्नी को पिटते नजर आए तो आश्चर्यचकित मत होना (मध्यप्रदेश का केस याद कीजिए), कोई मीडियांं में जाकर किसी पर अपराध साबित हुए बिना भी 6 महिनें तक प्राइम टाइम करता नजर आ जायेंगा और नेता बन गए तो महिलाओं को आतंकवादी और ना जाने क्या टैग दे आयेंगे या मारने तक की धमकी भी दे देंगे। इन सब पक्षों से बताना चाहता हूं कि अभी भी हमारे समाज का बड़ा तबका सच में महिलाओं को सम्मान और बराबरी देने में न केवल असहज है बल्कि इसमें उसको खुद के सम्मान में कटौती नजर आती है। वह महिला दिवस पर ही महिलाओं के सम्मान की बात कह सकता है या तब कह सकता है, जब उसकी विचारधारा या पार्टी का हित हो रहा हो।


पिछले महिनें के पहले सप्ताह दुनियाभर ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया , जिसकी शुरूआत को 112 साल के करीब हो गये। यह महिलाओं की गाढ़ी कमाई और विरासत को याद करने और कहां तक उनको समानता, अधिकार और सम्मान मिला इसको विश्लेषण का एक खास दिन होता है।

हाल में महिलाओं ने संघर्ष की कई मिसालें कायम की। पिंजरा-तौड़ आंदोलनकारी हो या नागरिकता आंदोलन की महिलाएं। कंपकपाती सर्दी में सरकार से लोहा लेती किसान आंदोलकारी हो या अन्य मुद्दों पर लड़ती नरवाल और दिशा जैसी तमाम महिलाएं, जिन्होंने यह अहसास और यकीन कराया कि महिलाएं अपने वजूद के लिए लड़ सकती है और वो भी तब, जब सबके सब उनके खिलाफ हो ; फिर भी वे अपनी आवाज दर्ज कराने में समर्थ है। इससे साबित होता है कि वे अब तुम्हारें ग्रंथों की अबला नारी नहीं है, वे मजबूत महिलाएं है, जिनको अपने हक के लिए संघर्ष करना आता है।


अब प्रबुद्ध लोगों, मीडियांं, संस्थाओं और राजनीतिक पार्टियों को भी अपने हितों से हटकर इन मुद्दों पर महिलाओं को समर्थन देना ही चाहिए। इसके चलते ही व्यवस्थाएं (या सरकारें) अपराध और अपराध-प्रवृति पर नकेल कसने के लिए विवश होगी तथा कोई इस तरह बेतुकी बयानबाजी भी नहीं करेंगा। हम ऐसे समाज को गढ़ने में स्वयं भी साथ दे, जहां सभ्यता के विकास में महिलाएं भी पुरूषों के समकक्ष दर्जा पा सके, जिससे उनको रूढ़िवादी (दोगले) समाज ने सदियों से वंचित रखा था।


The author is a post-graduate student, pursuing masters in History from Delhi University. The views and opinions expressed in this article belong solely to the author.

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